Tuesday, July 4, 2017

मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राज दुलारा



"अजी सुनते हो...कहाँ चले गए ?" 

" पंछी उठ गए। दुनिया उठ कर कहाँ से कहाँ पहुँच गयी। और एक ये महाशय हैं। सुबह के दस बज गए अभी तक सोता पड़ रहा है। बेटा जी, ऐसे नाम रोशन करोगे माँ -बाप का..हम्म।"

" डैड फिर आ गए आप...माँ यार...समझाओ अपने पति को। कमसकम सन्डे को तो सोने दो....रात देर तक पढ़ रहा था मैं।" करवट बदल कर तकिया के नीचे चेहरा छुपा कर वह फिर सो गया। 

" हमने तो कभी पढ़ा ही नहीं। घास काट कर क्लास वन अफ़सर बन गए। घर भर के कितने काम कर देते थे सुबह मुंह अँधेरे उठ कर...ये आजकल की औलादें। अपने से बड़ों की इज़्ज़त करना जैसे सीखा ही नहीं कभी।" 

" केवल बड़े हो इसलिए इज़्ज़त करें ? और.. और बताइये किस लिए इज़्ज़त करें ? सिवाय ताने देने के आप करतें ही क्या हैं ? हम ऐसे... तू ऐसा...फलां का बेटा इतना काबिल.. तू इतना नालायक...शर्मा अंकल ने अपने बेटे को बी एम डब्ल्यू दी है इस बर्थ डे पर। अब ?....आप क्या देंगे मुझे ? ख़ामख़्वाह ...डैड आप रहने दो...प्लीज़। खाली सुबह -सुबह..." 

" अजी सुनते हो। पड़े रहने दो नालायक को। आ जाओ। चाय ठंडी हो रही है।" पत्नी न मालूम किसे बचाने का प्रयास करती है। फटकार खाते जवान, धैर्यहीन बेटे को ? या फिर बेटे से दो टूक जवाब सुनते, शर्मिंदगी उठाते पति को। 

Tuesday, June 27, 2017

नंदादेवी के घर में महादेवी - मीरा कुटीर - रामगढ़, नैनीताल ( उत्तराखंड )

विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही 
उमड़ी कल थी मिट आज चली।  
मैं नीर भरी दुःख की बदली।




    





Tuesday, June 6, 2017

सुन रही हो पुष्पा



" माँ...कितनी बार कहा आपसे मेरा कमरा ठीक मत किया करो.... मेरी डायरी नहीं मिल रही। "

" हवा में नज़र रखता है। ठीक से देख। वहीं कहीं होगी। एक तो कमरा सड़ा के रखता है। ठीक कर दो तो इसकी दो बातें सुनो। "

" नहीं मिल रही यार माँ। आज के बाद फिर मेरी चीजों को हाथ मत लगाना। पता नहीं क्या परेशानी है इनको। "

"ऐसे बात करतें हैं अपनी माँ से ? इज़्ज़त करना सीखो बरखुरदार ! हमारे समय में मज़ाल हम.... "

" डैड प्लीज़ अब फिर से शुरू मत हो जाना। आप अपने समय से आगे क्यों नहीं बढ़ते कभी ? कुछ कदम ? वो पास्ट था... गया... अब प्रेजेंट की बात करिए डैड डिअर । "

"बद्तमीज़ होता जा रहा है ये लड़का। सुन रही हो...पुष्पा..." जवानी के दिनों में कितनी भी नोक झोंक क्यों न रही हो। बच्चों के जवान होते ही माता -पिता अपने दुःख -दर्द साझा करते हुए एक होने लगते हैं।  


Monday, May 29, 2017

एक हमारा ज़माना था



" सुन क्या कर रही है तू तब से ? चल आ खाना खा ले पहले। 

"टू मिनट्स माँ। " वह मोबाईल से आंखें नहीं हटा पाती। 

"आग लगे इस मोबाईल को। मोबाईल..और आजकल की ये नई पौध। जल्दी आ, फिर मैं किचन समेटूं। चंद्रा आती ही होगी। बर्तनों में पानी डाल कर नहीं रखो तो उसकी मिच -मिच सुनूं। क्या -क्या देखे औरत।"

"माँ यार क्या सुबह -सुबह। क्यों इतने काम अपनी जान को ले रखें हैं ? परेशान मत हो। चिल करो। हो जायेंगे। "

" हो जायेंगे ? बस तूने कह दिया और हो गए सारे काम। ससुराल जाओगी तब पता लगेगा। जब हम शादी करके इस घर में आये थे सारे कुनबे को...." 

"हो गए शुरू ? लाओ दो यार खाना। माँ... व्हॉट ? टिण्डा यक्क। "

" क्या टिण्डा .. लोगों को एक जून की रोटी नहीं मिल रही और तुम्हारे ये नखरे? अरे एक हमारा ज़माना था। हम पांच भाई -बहन थे। मजाल घर में.... " 

" माँ दे दो यार टिण्डा । खा लुंगी। बस फिर से अपने ज़माने की रामायण न शुरू कर देना। चिल... कूल। " 




Wednesday, May 17, 2017

उलझे हुए हैं आज सवालों की भीड़ में


जब 
हम सीख लेते हैं 
कहना सुनना और शब्दों से खेलना 
हमें 
लगता है 
हमने कविता कह दी 
जब 
हम सीख लेते हैं 
हंसना कुहुकना और चहकना 
हमें 
लगता है 
हम मलंग हो गए हैं 
जब
 हम सीख लेते हैं 
सड़कों जंगलों में भटकना 
हमें लगता है हम यायावर हो गए 
जब 
हम सीख लेते हैं 
मुस्करा कर आगे बढ़ जाना 
हमें 
लगता है 
हम जीना सीख गए हैं 
हम 
होते कुछ हैं
 खुद को समझ कुछ और लेते हैं


Tuesday, April 18, 2017

यात्रा - पत्रिका 'अहा! ज़िंदगी' के अप्रैल 2017 अंक में प्रकाशित हिमाचल यात्रा वृत्तांत

अभी सफ़र में कोई मोड़ ही नहीं आया 
निकल गया है ये चुपचाप दास्तान से कौन   
( अख्तर शुमार )


हिमाचल प्रदेश की रोमांचक यात्रा 
( संपादक - आलोक श्रीवास्तव )



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